दृष्टि पत्र
इस परिवेश में संतुलित एवं समुचित विकास कि आवश्यकता है. इस विषय की दृष्टि पत्र पर आप सबकी टिपण्णी चाहूंगा.)
पृष्ठभूमि
वर्तमान परिस्थितिओं को ध्यान में रखते हुए विकास की नयी दिशा निर्धारित करने की आवश्यकता है. ऐसा दो प्रमुख कारणों से है.
एक तरफ आज के असंतुलित एवं अनुचित विकास के परिणाम से स्वतंत्रता के सात दशकों के बाद भी देश के अधिकाँश लोग गरीबी रेखा के नीचे जी रहे हैं. आज विभिन्न सरकारी एवं निष्पक्ष आंकडो के अनुसार औसतन 50% लोग गरीबी रेखा से नीचे हैं. इतना ही नहीं, महंगाई, प्रदुषण और कुपोषण के दौर में यह अनुपात बढ़ता जा रहा है. हालात ऐसे हैं कि तथाकथित समृद्ध परिवार के बच्चे भी कुपोषण का शिकार हो रहे हैं.
दूसरी ओर पाश्चात्य के अंधाधुंध और अधकचरे अनुकरण से मूल्यों का बिखराव हो रहा है. शिक्षा स्तर में भी तेजी से गिरावट आ रही है. इस कारण से हम सही ढंग से अपने जीवन की प्राथमिकता नहीं तय कर पा रहे हैं. शुद्ध एवं पौष्टिक आहार, स्वच्छ एवं स्वास्थवर्धक वातावरण तथा बच्चों की सर्वोच्च शिक्षा के ऊपर खर्च करने की बजाय हम ऊपरी आडम्बर एवं गैर जरूरत की वस्तुएँ जैसे आलीशान मकान, मोटर कार, मोबाइल फोन, टेलीविजन पर अनुचित व्यय कर रहे हैं.
नयी दृष्टिकोण, नया दौर
- ग्राम पंचायत एवं जनपदों को सशक्त एवं स्व शाषित बनाने के सभी प्रावधान किये जाएँ. ग्रामीण क्षेत्रों की पिछले कई दशकों से हो रही उपेक्षा से लोगों ने जीविका एवं जीवन के साधनों की खोज में शहरों में पलायन किया है. इस विचित्र क्रम को रोकने के लिए एक ऐसे राष्ट्रीय अभियान की आवश्यकता है जिसके अंतर्गत एक ओर खाद्य पदार्थों की महंगाई को रोका जाए, वहीँ दूसरी ओर किसानों को उनके उपज – अनाज, फल, सब्जी, दूध इत्यादि – का पूरा मूल्य मिले. यह मूल्य कृषि क्षेत्र में बढते व्यय और अनेक विपदाओं को ध्यान में रखते हुए आज के मूल्यांकन से ३ से ४ गुना अधिक होनी चाहिए.
- इससे आने वाली ग्रामीण क्षेत्रों की समृद्धि और खुशहाली से स्वतः शहर में पलायन करने वाले अधिकाँश लोग अपने अपने क्षेत्रों में वापस लौटने का आकर्षण बढ़ेगा. एक तरफ ग्राम का समुचित विकास होगा, दूसरी ओर शहर में जनसँख्या संतुलित होगी. ग्राम के समुचित विकास की ओर शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता है. लोगों की आकांक्षाओं एवं आवश्यकता के अनुसार गौ, कृषि एवं ऋषि पर आधारित हमारी परंपरागत व्यवस्था को एक आधुनिक सन्दर्भ में पुनर्स्थापित किया जाना चाहिए.
- शहरों/जनपदों की भविष्य की योजना इस नए जनसंख्या के आधार पर किया जाना चाहिए. इसके साथ साथ शहर की सीमा में भी संतुलन की आवश्यकता है. इस नए दृष्टिकोण में किसी भी जनपद का व्यास ३ से ४ किलोमीटर से अधिक नहीं होना चाहिए. हर जनपद के चारों ओर २ से ३ किलोमीटर गायों के चरागाह एवं फल-सब्जी उगाने की व्यवस्था होना चाहिए.
- प्रत्येक ग्राम पंचायत एवं जनपद यथा संभव सौर उर्जा एवं अन्य अक्षय उर्जा स्त्रोतों से संचालित होनी चाहिए. ऐसा करने से वन एवं जल संसाधनों का संरक्षण होगा जिससे संतुलित एवं समुचित विकास को बल मिलेगा.
- प्रत्येक ग्राम पंचायत एवं जनपद के आतंरिक यातायात के लिए प्रदुषण फैलाने वाली मोटर युक्त वाहनों का केवल आपातकालीन परिस्थितिओं में उपयोग किया जाए. आतंरिक यातायात के लिए पैदल चलने एवं साइकिल से चलने को बढ़ावा दिया जाए, रिकशा एवं बिजली से चलने वाली अत्यंत हलके वाहनों का उपयोग किया जाए.
- जैसे जैसे जनपदों की जनसँख्या संतुलित होगी, वहाँ के घरों से उपार्जित कूरे -कचड़े और मल-मूत्र से दूषित जल का भी समुचित निवारण किया जा सकेगा. घरों के अंदर ही रसोई में उपार्जित जैविक अवशेषों से प्राकृतिक खाद बनाया जा सकेगा. आधुनिक तकनीक की मदद से अन्य अवशेषों से ऊर्जा का उत्पादन भी किया जा सकेगा.
- ऐसी व्यवस्था कायम की जायेगी जिसके अंतर्गत ग्राम एवं जनपदों में रहने वाले अधिकतम लोगों के शिक्षा एवं जीविकोपार्जन की अनेक सुविधाएँ उनके स्थानीय क्षेत्रों में ही उपलब्ध होंगे.
- आधुनिक सन्दर्भ में ग्राम एवं जनपदों के बीच एक सकारात्मक प्रतिस्पर्धा का वातावरण तैयार किया जाएगा जहां अनेक मापदंडों में उत्तम विकास के लिए पुरस्कार एवं सम्मान दिया जाए.
- आने वाले समय में इस दिशा में अग्रसर होता हुआ भारत विश्व की एक सांस्कृतिक एवं आर्थिक शक्ति बनकर उभरेगा एवं अन्य देशों के लिए विकास का एक नया मार्ग प्रशस्त करेगा.
भवदीय,
चंद्र विकास
संयोजक – संतुलित एवं समुचित विकास संस्थान
171, सेक्टर 2-बी , वैशाली, गाज़ियाबाद , उ. प्र. – 201010
मो: 96507 94905 email: chandra.vikash@gmail.com
संयोजक – संतुलित एवं समुचित विकास संस्थान
171, सेक्टर 2-बी , वैशाली, गाज़ियाबाद , उ. प्र. – 201010
मो: 96507 94905 email: chandra.vikash@gmail.com
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